शक्कर-दाल-LPG सब महंगा, मजदूरी वही, एक कमाने वाला और चार खाने वाले, कैसे चलेगा घर
रसोई से लेकर गैस तक आग: क्या महंगाई पर लगेगा ब्रेक या यूं ही पिसेगा आम आदमी
युवा बेरोजगार, मजदूर लाचार, महंगाई बेलगाम: मिडिल क्लास और गरीब के घर का गणित बिगड़ा
घर चलाना हुआ मुश्किल: कमाई आधी, खर्च दोगुना, आम आदमी पूछ रहा – महंगाई कब घटेगी
रसोई से रोजगार तक: महंगाई की दोहरी मार से जूझ रहा आम आदमी, मिडिल क्लास से लेकर मजदूर तक परेशान
रामपुरा/देश। आज के समय में एक आम परिवार के लिए घर चलाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। चाहे वो मिडिल क्लास हो या गरीब, मजदूर हो या किसान, हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है – महंगाई कम होगी या नहीं?
रसोई पर सीधा असर
पिछले कुछ महीनों में रोजमर्रा की चीजों के दाम तेजी से बढ़े हैं।
- शक्कर जो कभी 40 रुपए किलो थी, आज 70 पार है।
- दालें 100 से 200 रुपए किलो तक पहुंच गई हैं।
- LPG सिलेंडर 400 से बढ़कर 900-1100 रुपए तक पहुंच गया है।
- तेल, सब्जी, आटा, सबके दाम में 20 से 30% की बढ़ोतरी।
एक गृहिणी ने बताया – “पहले 5000 में महीना चल जाता था, अब 8000 में भी पूरा नहीं पड़ता।”
मजदूर और युवा की दोहरी पीड़ा
दूसरी तरफ कमाई नहीं बढ़ी है। मजदूरों को आज भी 300-400 रुपए मजदूरी मिल रही है, वो भी रोज नहीं। मनरेगा में भी काम कम है।
एक घर में एक ही कमाने वाला है और 4-5 खाने वाले। युवा पढ़-लिखकर बेरोजगार घूम रहे हैं। प्राइवेट नौकरी में 8-10 हजार से ज्यादा नहीं मिलता, उसमें भी महंगाई का खर्च नहीं निकलता।
आंकड़ा क्या कहता है?
देश में खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation) पिछले साल 5-6% के आसपास रही है, लेकिन आम आदमी की थाली की महंगाई इससे कहीं ज्यादा महसूस हो रही है। RBI महंगाई रोकने के लिए प्रयास कर रहा है, पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और खाद्य तेल के दाम बढ़ने से असर सीधे रसोई पर पड़ रहा है।
आम आदमी की 3 बड़ी मांग
- LPG सिलेंडर पर सब्सिडी फिर से शुरू की जाए, कम से कम गरीब और उज्ज्वला परिवारों के लिए।
- दाल, शक्कर, तेल जैसी जरूरी चीजों पर सरकारी राशन दुकानों पर नियंत्रण रखा जाए।
- युवाओं के लिए रोजगार और मजदूरों की दिहाड़ी महंगाई के हिसाब से बढ़ाई जाए।
सरकार योजनाएं ला रही है – फ्री राशन, उज्ज्वला, लाडली बहना, किसान सम्मान निधि से राहत मिल रही है, लेकिन बढ़ती महंगाई के सामने ये राहत छोटी पड़ रही है।
अब देखना है कि आने वाले बजट और नीतियों में आम आदमी की इस पीड़ा पर कितना मरहम लगता है।